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ramayan 5.56.50: अरिष्ट पर्वत तीस योजन ऊँचा और दस योजन चौड़ा था, फिर भी उसके पैरों के दबाव से वह ज़मीन के बराबर हो गया।   |   ramayan सर्ग 5.56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  5.56.50 
दशयोजनविस्तारस्त्रिंशद्योजनमुच्छ्रित:।
धरण्यां समतां यात: स बभूव धराधर:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
अरिष्ट पर्वत तीस योजन ऊँचा और दस योजन चौड़ा था, फिर भी उसके पैरों के दबाव से वह ज़मीन के बराबर हो गया।
 
The Arishta mountain was thirty yojanas high and ten yojanas wide. Yet it became equal to the ground under the pressure of his feet. 50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)