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ramayan 5.56.47: चमकती हुई जीभ वाले विशाल, बलवान और विषैले सर्प अपने फन और कंठों को लपेटे हुए थे ॥47॥   |   ramayan सर्ग 5.56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.56.47 
अतिप्रमाणा बलिनो दीप्तजिह्वा महाविषा:।
निपीडितशिरोग्रीवा व्यवेष्टन्त महाहय:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
चमकती हुई जीभ वाले विशाल, बलवान और विषैले सर्प अपने फन और कंठों को लपेटे हुए थे ॥47॥
 
The huge, powerful and venomous serpents with shining tongues coiled up their hoods and throats. ॥47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)