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ramayan 5.56.31: वह पर्वत, पवन के झोंकों में हिलता हुआ, मधुर ध्वनि करते बाँसों से सुशोभित, ऐसा प्रतीत होता था मानो बाँसुरी बजा रहा हो। भयानक विषैले साँपों की फुँफकार से ऐसा प्रतीत होता था मानो वह लम्बी साँसें ले रहा हो।   |   ramayan सर्ग 5.56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 56: हनुमान जी का पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्र को लाँघना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.56.31 
वेणुभिर्मारुतोद्‍धूतै: कूजन्तमिव कीचकै:।
नि:श्वसन्तमिवामर्षाद् घोरैराशीविषोत्तमै:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वह पर्वत, पवन के झोंकों में हिलता हुआ, मधुर ध्वनि करते बाँसों से सुशोभित, ऐसा प्रतीत होता था मानो बाँसुरी बजा रहा हो। भयानक विषैले साँपों की फुँफकार से ऐसा प्रतीत होता था मानो वह लम्बी साँसें ले रहा हो।
 
That mountain, swaying in the gusts of wind and adorned with bamboos making sweet sounds, looked as if it was playing a flute. The hissing of the terrifying venomous serpents made it seem as if it was drawing a long breath.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)