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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.55.6 
य: समुत्पतितं क्रोधं क्षमयैव निरस्यति।
यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य हृदय में उत्पन्न हुए क्रोध को क्षमा के द्वारा वैसे ही दूर कर देता है जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली को उतार फेंकता है, उसे मनुष्य कहते हैं।
 
He who by forgiveness removes the anger that arises in the heart, like a snake sheds its old skin, is called a man. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)