श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.55.4 
क्रुद्ध: पापं न कुर्यात् क: क्रुद्धो हन्याद् गुरूनपि।
क्रुद्ध: परुषया वाचा नर: साधूनधिक्षिपेत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
क्रोध में भरकर कौन पाप नहीं करता? क्रोध में भरकर मनुष्य अपने बड़ों को भी मार डालता है। क्रोधी मनुष्य संतों की भी कठोर वाणी से निन्दा करने लगता है।॥4॥
 
‘Who does not commit sins when filled with anger? A man overcome by anger can even kill his elders. An angry man starts criticising even the saints with harsh words.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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