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ramayan 5.55.20: ‘अतः सीता की रक्षा न करके मैंने अपने धन और धर्म का नाश कर दिया है, इसलिए मैं बड़ा अभागा हूँ। मेरे हृदय में क्रोध का विकार व्याप्त हो गया है, इसलिए मैं निश्चय ही सम्पूर्ण जगत् का नाश करने वाला हो गया हूँ - सम्पूर्ण जगत् के नाश का पाप मुझे अवश्य सहना पड़ेगा।’॥20॥   |   ramayan सर्ग 5.55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.55.20 
तदहं भाग्यरहितो लुप्तधर्मार्थसंग्रह:।
रोषदोषपरीतात्मा व्यक्तं लोकविनाशन:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
‘अतः सीता की रक्षा न करके मैंने अपने धन और धर्म का नाश कर दिया है, इसलिए मैं बड़ा अभागा हूँ। मेरे हृदय में क्रोध का विकार व्याप्त हो गया है, इसलिए मैं निश्चय ही सम्पूर्ण जगत् का नाश करने वाला हो गया हूँ - सम्पूर्ण जगत् के नाश का पाप मुझे अवश्य सहना पड़ेगा।’॥20॥
 
‘Therefore, by not protecting Sita, I have destroyed my wealth and Dharma, and therefore I am very unfortunate. My heart has been overcome by the vice of anger, and therefore I have surely become the destroyer of the whole world – I will have to share the sin of destroying the entire world.’॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)