श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.55.2 
तस्याभूत् सुमहांस्त्रास: कुत्सा चात्मन्यजायत।
लङ्कां प्रदहता कर्म किंस्वित् कृतमिदं मया॥ २॥
 
 
अनुवाद
उसी समय उसे बड़ा भय हुआ और वह अपने आप से घृणा करने लगा। वह मन ही मन कहने लगा, 'हाय! लंका जलाते समय मैंने यह कैसा घोर कर्म कर दिया?॥ 2॥
 
At the same time, he was overcome with great fear and began to hate himself. He began to say to himself, 'Alas! What a heinous deed have I committed while burning Lanka?॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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