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ramayan 5.55.18: फिर यह समाचार सुनकर भ्राता और धर्मात्मा भरत और शत्रुघ्न भी अपना जीवन कैसे चला सकेंगे?॥18॥   |   ramayan सर्ग 5.55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.55.18 
एतदेव वच: श्रुत्वा भरतो भ्रातृवत्सल:।
धर्मात्मा सहशत्रुघ्न: कथं शक्ष्यति जीवितुम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
फिर यह समाचार सुनकर भ्राता और धर्मात्मा भरत और शत्रुघ्न भी अपना जीवन कैसे चला सकेंगे?॥18॥
 
‘Then after hearing this news how will even the brotherly and virtuous Bharata and Shatrughna be able to continue their lives?॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)