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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.55.16 
धिगस्तु राजसं भावमनीशमनवस्थितम्।
ईश्वरेणापि यद् रागान्मया सीता न रक्षिता॥ १६॥
 
 
अनुवाद
यह राजस भाव कार्य करने में असमर्थ है और अव्यवस्थित है; इसे धिक्कार है; इस रजोगुणी क्रोध के कारण ही मैंने समर्थ होते हुए भी सीता की रक्षा नहीं की॥16॥
 
This Rajas emotion is incapable of accomplishing tasks and is disorganised; shame on it; because of this Rajoguna-based anger I did not protect Sita despite being capable.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)