श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 55: सीताजी के लिये हनुमान् जी की चिन्ता और उसका निवारण  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.55.12 
यदि तद्विहतं कार्यं मया प्रज्ञाविपर्ययात्।
इहैव प्राणसंन्यासो ममापि ह्यद्य रोचते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
यदि मैंने अपने कुविचार से सारा काम बिगाड़ दिया है, तो आज यहीं मर जाऊँ। यही मुझे अच्छा लगता है॥12॥
 
If I have ruined the whole work due to my wrong thinking, then I should die here today. This seems good to me.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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