नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां तृणानां च यथा तथा॥ २८॥
हनूमान् राक्षसेन्द्राणां वधे किंचिन्न तृप्यति।
न हनूमद्विशस्तानां राक्षसानां वसुन्धरा॥ २९॥
अनुवाद
जैसे सूखी लकड़ी और तिनकों को जलाने से अग्नि कभी तृप्त नहीं होती, वैसे ही हनुमानजी बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर कभी तृप्त नहीं हुए और हनुमानजी द्वारा मारे गए राक्षसों को गोद में लेकर भी पृथ्वी माता कभी तृप्त नहीं हुईं ॥28-29॥
Just as fire is never satisfied by burning dry wood and straws, similarly Hanuman was never satisfied by killing big demons and even Mother Earth was never satisfied by holding in her lap the demons killed by Hanuman. ॥28-29॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥