श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 53: राक्षसों का हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.53.33 
दह्यमाने च लाङ्गूले चिन्तयामास वानर:।
प्रदीप्तोऽग्निरयं कस्मान्न मां दहति सर्वत:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उधर जब उनकी पूँछ में आग लग गई, तब हनुमान्‌जी सोचने लगे कि 'अहा! यह अग्नि सब ओर से प्रज्वलित होने पर भी मुझे क्यों नहीं जलाती?॥ 33॥
 
On the other hand, when his tail was set on fire, Hanumanji began to think, 'Oh! Why does this fire not burn me even though it is blazing from all sides?॥ 33॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas