श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 53: राक्षसों का हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.53.31 
ततस्तीक्ष्णार्चिरव्यग्र: प्रदक्षिणशिखोऽनल:।
जज्वाल मृगशावाक्ष्या: शंसन्निव शुभं कपे:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हरिणरूपी सीता की प्रार्थना सुनकर अग्निदेव अपनी प्रचण्ड ज्वालाओं से शान्त भाव से जलने लगे, मानो हनुमानजी को उनके सौभाग्य की सूचना दे रहे हों। उनकी ज्वाला गोलाकार गति से ऊपर उठने लगी॥31॥
 
Upon hearing the prayers of doe-eyed Sita, the fire god with its fiery flames began to burn peacefully, as if informing her of Hanuman's good fortune. His flame began to rise in a circular motion.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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