श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 53: राक्षसों का हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  5.53.15-16h 
अवश्यमेव द्रष्टव्या मया लङ्का निशाक्षये।
कामं बध्नन्तु मे भूय: पुच्छस्योद्दीपनेन च॥ १५॥
पीडां कुर्वन्ति रक्षांसि न मेऽस्ति मनस: श्रम:।
 
 
अनुवाद
अतः मुझे दिन निकलने पर लंका अवश्य देखनी चाहिए। यदि ये राक्षस मुझे बार-बार बाँधकर मेरी पूँछ में आग लगाकर कष्ट भी दें, तो भी मेरे हृदय में इससे कोई पीड़ा नहीं होगी।॥15 1/2॥
 
‘Therefore, I must see Lanka when the day dawns. Even if these demons tie me up again and again and torment me by setting my tail on fire, I will not feel any pain in my heart because of this.'॥15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)