श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 52: विभीषण का दूत के वध को अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देने के लिये कहना तथा रावण का उनके अनरोध को स्वीकार कर लेना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.52.24 
अस्मिन् विनष्टे नहि भूतमन्यं
पश्यामि यस्तौ नरराजपुत्रौ।
युद्धाय युद्धप्रिय दुर्विनीता-
वुद्योजयेद् वै भवता विरुद्धौ॥ २४॥
 
 
अनुवाद
हे युद्धप्रिय राजन! इसके नष्ट हो जाने पर मुझे कोई दूसरा प्राणी नहीं दिखाई देता जो आपके विरोधी उन दोनों स्वतन्त्र स्वभाव वाले राजकुमारों को युद्ध के लिए तैयार कर सके॥ 24॥
 
O war-loving king! After this is destroyed I do not see any other creature who can prepare those two princes of independent nature, who are opposing you, for war.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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