श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 52: विभीषण का दूत के वध को अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देने के लिये कहना तथा रावण का उनके अनरोध को स्वीकार कर लेना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.52.16 
कथं च धर्मार्थविनीतबुद्धि:
परावरप्रत्ययनिश्चितार्थ:।
भवद्विध: कोपवशे हि तिष्ठेत्
कोपं न गच्छन्ति हि सत्त्ववन्त:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
आपकी बुद्धि धर्म और अर्थ के ज्ञान से ओतप्रोत है। आप पक्ष-अपक्ष का विचार करके कर्तव्य का निर्णय करते हैं। आप जैसे ज्ञानी पुरुष क्रोध कैसे कर सकते हैं? क्योंकि शक्तिशाली पुरुष क्रोध नहीं करते।
 
‘Your intellect is imbued with the knowledge of Dharma and Artha. You decide the duty after considering the pros and cons. How can a wise man like you be subject to anger? Because powerful men do not get angry.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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