श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी का श्रीराम के प्रभाव का वर्णन करते हुए रावण को समझाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.51.33 
अपकुर्वन् हि रामस्य साक्षादपि पुरंदर:।
न सुखं प्राप्नुयादन्य: किं पुनस्त्वद्विधो जन:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
भगवान् रामजी का अपराध करके स्वयं इन्द्र भी सुख नहीं पा सकते, फिर आप जैसे सामान्य मनुष्यों की क्या बात है?॥ 33॥
 
Even Indra himself cannot find happiness by committing an offence against Lord Rama, then what about ordinary people like you?॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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