श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी का श्रीराम के प्रभाव का वर्णन करते हुए रावण को समझाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.51.25 
तप:संतापलब्धस्ते सोऽयं धर्मपरिग्रह:।
न स नाशयितुं न्याय्य आत्मप्राणपरिग्रह:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
"तपस्या के कष्टों को सहकर धर्म के फलस्वरूप जो धन तुमने संचित किया है तथा जो शरीर और आत्मा को दीर्घकाल तक धारण करने की शक्ति है, उसे नष्ट करना उचित नहीं है।" ॥25॥
 
"The wealth that you have accumulated as a result of Dharma by undergoing the hardships of austerity and the power to hold on to the body and the soul for a long time is not proper to destroy it." ॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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