श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 51: हनुमान जी का श्रीराम के प्रभाव का वर्णन करते हुए रावण को समझाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.51.17 
तद् भवान् दृष्टधर्मार्थस्तप:कृतपरिग्रह:।
परदारान् महाप्राज्ञ नोपरोद‍्धुं त्वमर्हसि॥ १७॥
 
 
अनुवाद
महामते! आप धर्म और अर्थ का सार जानते हैं। आपने बहुत तप किया है। अतः आपके लिए किसी दूसरे की पत्नी को अपने घर में रखना उचित नहीं है॥ 17॥
 
‘Mahamate! You know the essence of Dharma and Artha. You have accumulated a lot of penance. Therefore, it is not at all appropriate for you to keep another's wife in your house.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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