श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 49: रावण के प्रभावशाली स्वरूप को देखकर हनुमान जी के मन में अनेक प्रकार के विचारों का उठना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.49.17 
अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युति:।
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अहा! इस राक्षसराज का रूप कितना अद्भुत है! इसमें कितना विलक्षण धैर्य है! इसमें कितनी अतुलनीय शक्ति है! इसमें कितना अद्भुत तेज है! इसमें समस्त राजसी गुणों का होना कितना आश्चर्य की बात है!॥17॥
 
‘Oh! How wonderful is the form of this demon king! What a unique patience he has! What a matchless power! And what an astonishing brilliance he has! How astonishing it is that he is endowed with all the royal characteristics!॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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