श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  5.48.61 
यथाक्रमं तै: स कपिश्च पृष्ट:
कार्यार्थमर्थस्य च मूलमादौ।
निवेदयामास हरीश्वरस्य
दूत: सकाशादहमागतोऽस्मि॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
सबसे पहले उन सबने हनुमान् से उनके कार्य, उद्देश्य और मूल कारण के बारे में पूछा, तब उन्होंने बताया कि 'मैं वानरराज सुग्रीव का दूत बनकर आया हूँ।'॥61॥
 
First of all they all asked Hanuman about his work, purpose and its root cause. Then he told that 'I have come from the monkey king Sugreeva as his messenger.'॥ 61॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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