श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.48.6 
ममानुरूपं तपसो बलं च ते
पराक्रमश्चास्त्रबलं च संयुगे।
न त्वां समासाद्य रणावमर्दे
मन: श्रमं गच्छति निश्चितार्थम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारा आध्यात्मिक बल, युद्ध में पराक्रम और शस्त्रों में बल मेरे समान ही है। तुम्हें युद्धभूमि में पाकर मेरा मन कभी दुःखी या शोकाकुल नहीं होता, क्योंकि उसे विश्वास है कि विजय तुम्हारी ही होगी॥6॥
 
‘Your spiritual power, bravery in battle and strength in weapons are equal to mine. My mind never feels sad or sorrowful on finding you on the battlefield because it has the surety that victory will be on your side.॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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