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श्लोक 5.48.55  |
कोऽयं कस्य कुतो वापि किं कार्यं कोऽभ्युपाश्रय:।
इति राक्षसवीराणां दृष्ट्वा संजज्ञिरे कथा:॥ ५५॥ |
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| अनुवाद |
| उसे देखकर वीर राक्षस आपस में कहने लगे, 'यह कौन है? किसका पुत्र या सेवक है? यह कहाँ से आया है? इसका यहाँ क्या काम है? और कौन इसकी सहायता कर रहा है?॥ 55॥ |
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| On seeing him the brave demons began to say amongst themselves, 'Who is this? Whose son or servant is he? Where has he come from? What is his work here? And who is helping him?॥ 55॥ |
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