श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  5.48.48 
स बद्धस्तेन वल्केन विमुक्तोऽस्त्रेण वीर्यवान्।
अस्त्रबन्ध: स चान्यं हि न बन्धमनुवर्तते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
छाल की रस्सी से बाँधे जाने पर वीर हनुमान ब्रह्मास्त्र के बंधन से मुक्त हो गए क्योंकि वह अस्त्र किसी अन्य बंधन से नहीं बँध सकता ॥48॥
 
When tied with the bark rope, the valiant Hanuman was freed from the bondage of the Brahmastra because that weapon cannot be bound by any other bond. ॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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