श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.48.42 
स वीर्यमस्त्रस्य कपिर्विचार्य
पितामहानुग्रहमात्मनश्च।
विमोक्षशक्तिं परिचिन्तयित्वा
पितामहाज्ञामनुवर्तते स्म॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ हनुमान्‌जी ने उस अस्त्र की शक्ति, अपने ऊपर पितामह की कृपा और उसके बंधन से स्वयं को मुक्त करने की अपनी क्षमता पर विचार करके अन्त में ब्रह्माजी की आज्ञा का पालन किया॥42॥
 
The best Hanuman ji, after considering the power of that weapon, his grandfather's grace on him and his ability to free himself from its bondage, finally followed Brahma ji's orders. 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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