श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.48.41 
न मेऽस्य बन्धस्य च शक्तिरस्ति
विमोक्षणे लोकगुरो: प्रभावात्।
इत्येवमेवं विहितोऽस्त्रबन्धो
मयाऽऽत्मयोनेरनुवर्तितव्य:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तब वह सोचने लगा कि, ‘लोकगुरु ब्रह्मा के प्रभाव से मुझमें इस अस्त्र के बंधन से छूटने की शक्ति नहीं है - ऐसा सोचकर ही इन्द्रजित ने मुझे इस प्रकार बाँधा है, तथापि ब्रह्माजी का मान रखने के लिए मुझे इस अस्त्र के बंधन का पालन करना चाहिए ॥’ 41॥
 
Then he started thinking, 'I do not have the power to free myself from the bondage of this weapon due to the influence of Lokguru Brahma - considering this, Indrajit has bound me in this way, however, I should follow this bondage of weapon to honor Lord Brahma.' 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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