श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.48.37 
अवध्योऽयमिति ज्ञात्वा तमस्त्रेणास्त्रतत्त्ववित्।
निजग्राह महाबाहुं मारुतात्मजमिन्द्रजित्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
अस्त्र-तत्त्व के ज्ञाता इन्द्रजित ने महाबाहु पवनकुमार को व्यर्थ जानकर उसे उस अस्त्र से बाँध दिया ॥37॥
 
Indrajit, the knower of the principle of weapon, considered the mighty-armed Pawankumar to be useless and tied him to that weapon. 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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