श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.48.35 
ततो मतिं राक्षसराजसूनु-
श्चकार तस्मिन् हरिवीरमुख्ये।
अवध्यतां तस्य कपे: समीक्ष्य
कथं निगच्छेदिति निग्रहार्थम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वानरों में श्रेष्ठ उस हनुमान् को अजेय समझकर राक्षसराज मेघनाद वीर वानरों में प्रधान हनुमान् के विषय में सोचने लगा कि 'उसे किसी प्रकार पकड़ना ही होगा, परन्तु मैं उसे कैसे पकड़ सकूँगा?'॥ 35॥
 
Considering that best of apes as invincible, the demon prince Meghnad began to think about Hanuman, the chief of the brave monkeys, that 'He must be captured somehow, but how can he be caught by me?'॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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