श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.48.33 
हनूमतो वेद न राक्षसोऽन्तरं
न मारुतिस्तस्य महात्मनोऽन्तरम्।
परस्परं निर्विषहौ बभूवतु:
समेत्य तौ देवसमानविक्रमौ॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उस राक्षस को हनुमान पर आक्रमण करने का अवसर नहीं मिला और पवनकुमार हनुमान को भी उस महायोद्धा को दबाने का अवसर नहीं मिला। देवताओं के समान पराक्रमी वे दोनों वीर योद्धा आपस में लड़कर एक-दूसरे के लिए असह्य हो गए थे॥33॥
 
That demon did not get a chance to attack Hanuman and even Pawankumar Hanuman did not get a chance to subdue that great warrior. Both those brave warriors, as mighty as the gods, had become unbearable for each other after fighting with each other. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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