श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.48.32 
तावुभौ वेगसम्पन्नौ रणकर्मविशारदौ।
सर्वभूतमनोग्राहि चक्रतुर्युद्धमुत्तमम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वे दोनों वीर योद्धा बड़े ही वेगवान और युद्धकला में निपुण थे। उन्होंने ऐसा उत्तम युद्ध किया, जिसने समस्त प्राणियों का मन मोह लिया।
 
Both those brave warriors were very swift and were adept in the art of war. They started fighting an excellent battle which attracted the minds of all creatures.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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