श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  5.48.27 
स तस्य वीरस्य महारथस्य
धनुष्मत: संयति सम्मतस्य।
शरप्रवेगं व्यहनत् प्रवृद्ध-
श्चचार मार्गे पितुरप्रमेय:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अत्यन्त बलवान हनुमान्‌जी विशाल शरीर धारण करके अपने पिता वायु के मार्ग पर विचरण करने लगे और युद्ध में सम्मानित उस महान् धनुर्धर राक्षस योद्धा के बाणों के महान वेग को नष्ट करने लगे॥27॥
 
The immeasurably powerful Hanuman ji assumed a huge body and started wandering on the path of his father Vayu and wasting the great speed of the arrows of that great archer, the demon warrior who was honored in the war. 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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