श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.48.21 
इन्द्रजिच्चापमादाय शितशल्यांश्च सायकान्।
हनूमन्तमभिप्रेत्य जगाम रणपण्डित:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
इंद्रजीत युद्धकला में निपुण था। धनुष और तीखे बाणों से सुसज्जित होकर वह हनुमान की ओर बढ़ा।
 
Indrajit was proficient in the art of war. Armed with a bow and sharp pointed arrows, he advanced towards Hanuman.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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