श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.48.2 
त्वमस्त्रविच्छस्त्रभृतां वरिष्ठ:
सुरासुराणामपि शोकदाता।
सुरेषु सेन्द्रेषु च दृष्टकर्मा
पितामहाराधनसंचितास्त्र:॥ २॥
 
 
अनुवाद
पुत्र! तुमने ब्रह्माजी की आराधना करके अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। तुम अस्त्र-शस्त्रों के स्वामी, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ तथा देवताओं और दानवों को शोक देने वाले हो। तुम्हारा पराक्रम इन्द्र सहित समस्त देवताओं के समुदाय में देखा गया है। 2॥
 
Son! You have gained knowledge of many types of weapons by worshiping Lord Brahma. You are a master of weapons, the best among weapon-wielders and the one who gives grief to gods and demons. Your bravery has been seen in the community of all the gods including Indra. 2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas