श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.48.14 
नानाशस्त्रेषु संग्रामे वैशारद्यमरिंदम।
अवश्यमेव बोद्धव्यं काम्यश्च विजयो रणे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
शत्रु! वीर पुरुष को युद्ध में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए तथा युद्ध में विजय की कामना भी करनी चाहिए ॥14॥
 
Enemy! A brave man must acquire proficiency with various types of weapons in battle and must also aspire to victory in battle. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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