श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.48.12 
तमेवमर्थं प्रसमीक्ष्य सम्यक्
स्वकर्मसाम्याद्धि समाहितात्मा।
स्मरंश्च दिव्यं धनुषोऽस्य वीर्यं
व्रजाक्षतं कर्म समारभस्व॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'इन सब बातों पर अच्छी तरह विचार करके यह समझो कि तुम्हारा विरोधी भी तुम्हारे समान ही पराक्रमी है और मन को एकाग्र करो - सावधान रहो। अपने धनुष की दिव्य शक्ति का स्मरण करते हुए आगे बढ़ो और ऐसा पराक्रम दिखाओ कि वह व्यर्थ न जाए।'
 
‘After thinking over all these things well, consider that your opponent is as valorous as you and concentrate your mind – be cautious. Remembering the divine power of your bow, move ahead and demonstrate such valor that it does not go in vain.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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