श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.48.11 
न वीर सेना गणशो च्यवन्ति
न वज्रमादाय विशालसारम्।
न मारुतस्यास्ति गतिप्रमाणं
न चाग्निकल्प: करणेन हन्तुम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'वीर! तुम्हें अपने साथ सेना नहीं ले जानी चाहिए; क्योंकि वे सेनाएँ या तो समूह बनाकर भाग जाती हैं या मारी जाती हैं। इसी प्रकार, अत्यन्त तीक्ष्ण और कठोर वज्र भी साथ ले जाने की आवश्यकता नहीं है (क्योंकि वह उन पर व्यर्थ सिद्ध हो चुका है)। उन वायुपुत्र हनुमान्‌ के तेज या पराक्रम की कोई सीमा या माप नहीं है। अग्नि के समान तेजस्वी उस वानर को किसी विशेष उपाय से नहीं मारा जा सकता।॥ 11॥
 
‘Valiant one! You should not take an army with you; because those armies either flee away in groups or are killed. Similarly, there is no need to take along a thunderbolt which is very sharp and hard (because it has proved useless on him). There is no measure or limit to the speed or power of that Vayuputra Hanuman. That monkey as bright as fire cannot be killed by any special means.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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