श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 48: इन्द्रजित और हनुमान जी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमान् जी का रावण के दरबार में उपस्थित होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.48.1 
ततस्तु रक्षोऽधिपतिर्महात्मा
हनूमताक्षे निहते कुमारे।
मन: समाधाय स देवकल्पं
समादिदेशेन्द्रजितं सरोष:॥ १॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर जब हनुमान जी ने अक्षकुमार को मार डाला, तब राक्षसों के स्वामी महाबली रावण ने किसी प्रकार अपने मन को स्थिर किया और क्रोध से आगबबूला होकर देवताओं के समान पराक्रमी कुमार इन्द्रजित (मेघनाद) को इस प्रकार आज्ञा दी - 1॥
 
Subsequently, after Hanuman ji killed Akshakumar, the great Ravana, the lord of the demons, somehow managed to steady his mind and became furious with rage and ordered Kumar Indrajit (Meghnad), who was as mighty as the gods, in this manner - 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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