श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 47: रावणपुत्र अक्ष कुमार का पराक्रम और वध  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  5.47.38 
निहत्य तं वज्रिसुतोपमं रणे
कुमारमक्षं क्षतजोपमेक्षणम्।
तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणं
कृतक्षण: काल इव प्रजाक्षये॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र के पुत्र जयन्त के समान पराक्रमी और लाल नेत्रों वाले अक्षकुमार को युद्ध में मारकर, लोगों का संहार करने के लिए तत्पर हुए पराक्रमी हनुमान्‌जी पुनः युद्ध की प्रतीक्षा करते हुए मृत्यु के समान उद्यान के उसी द्वार पर पहुँचे।
 
Having killed Akshkumar, who was as valiant as Indra's son Jayant and had red eyes, in the battle, the valiant Hanuman, prepared to kill the people, again like death, waiting for the battle, reached the same gate of the garden.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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