श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 47: रावणपुत्र अक्ष कुमार का पराक्रम और वध  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  5.47.29 
न खल्वयं नाभिभवेदुपेक्षित:
पराक्रमो ह्यस्य रणे विवर्धते।
प्रमापणं ह्यस्य ममाद्य रोचते
न वर्धमानोऽग्निरुपेक्षितुं क्षम:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
किन्तु यदि इसकी उपेक्षा की गई, तो यह मुझे पराजित करने में असफल नहीं होगा; क्योंकि युद्ध में इसका पराक्रम बढ़ता जा रहा है। अतः मुझे इसे अभी मार डालना ही श्रेयस्कर प्रतीत होता है। बढ़ती हुई अग्नि की उपेक्षा करना कभी उचित नहीं है।॥29॥
 
‘But if it is ignored, it will not fail to defeat me; because its prowess in the battle is increasing. Therefore, it seems better to me to kill it now. It is never right to ignore the increasing fire.’॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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