श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 47: रावणपुत्र अक्ष कुमार का पराक्रम और वध  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  5.47.26 
अबालवद् बालदिवाकरप्रभ:
करोत्ययं कर्म महन्महाबल:।
न चास्य सर्वाहवकर्मशालिन:
प्रमापणे मे मतिरत्र जायते॥ २६॥
 
 
अनुवाद
यह पराक्रमी अक्षकुमार बालक सूर्य के समान तेजस्वी है और बालक होने पर भी प्रौढ़ों के समान महान् कर्म कर रहा है। समस्त युद्ध-कार्यों में निपुण होने के कारण अत्यंत सुन्दर इस वीर पुरुष को मारने की मेरी इच्छा नहीं होती॥ 26॥
 
This mighty son of Akshkumar is as radiant as the child sun and even though he is a child, he is performing great deeds like an adult. I do not feel like killing this brave man who is extremely handsome due to his skill in all the battle-related activities.॥ 26॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas