श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 47: रावणपुत्र अक्ष कुमार का पराक्रम और वध  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.47.25 
तत: शरैर्भिन्नभुजान्तर: कपि:
कुमारवर्येण महात्मना नदन्।
महाभुज: कर्मविशेषतत्त्वविद्
विचिन्तयामास रणे पराक्रमम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
इतने में ही महारथी अक्षकुमार ने वानरश्रेष्ठ हनुमानजी की छाती में बाणों से प्रहार किया। वह महाबली वानरयोद्धा समयानुसार विशेष कर्तव्य को भली-भाँति जानता था; अतएव वह युद्धभूमि में उस प्रहार को सहता हुआ सिंह के समान गर्जना करता हुआ अपने पराक्रम का इस प्रकार चिन्तन करने लगा -॥25॥
 
Meanwhile, the great warrior Akshkumar struck the chest of Hanuman, the best of the apes, between his arms with his arrows. That mighty monkey warrior knew exactly the special duty required at the right time; therefore, bearing that blow in the battlefield, he roared like a lion and started thinking about his valour in this manner -॥25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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