श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 47: रावणपुत्र अक्ष कुमार का पराक्रम और वध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.47.2 
स तस्य दृष्टॺर्पणसम्प्रचोदित:
प्रतापवान् काञ्चनचित्रकार्मुक:।
समुत्पपाताथ सदस्युदीरितो
द्विजातिमुख्यैर्हविषेव पावक:॥ २॥
 
 
अनुवाद
पिता की दृष्टि मात्र से प्रेरित होकर वह वीर योद्धा युद्ध के लिए उत्साहपूर्वक उठ खड़ा हुआ। उसका धनुष स्वर्णजटित होने के कारण अद्वितीय शोभा से सुशोभित था। जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा यज्ञवेदी में आहुति देने पर अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार वह भी सभा में उठ खड़ा हुआ॥2॥
 
Inspired by the mere glance of his father, that valiant warrior stood up enthusiastically for the battle. His bow was adorned with a unique beauty because it was studded with gold. Just as the fire god blazes up when the best Brahmins offer oblations in the sacrificial altar, similarly he too stood up in the assembly.॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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