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श्लोक 5.46.41  |
तत: कपिस्तान् ध्वजिनीपतीन् रणे
निहत्य वीरान् सबलान् सवाहनान्।
तथैव वीर: परिगृह्य तोरणं
कृतक्षण: काल इव प्रजाक्षये॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| युद्धस्थल में सेना और वाहनोंसहित उन पाँचों वीर सेनापतियों को मारकर महाबली हनुमान्जी पुनः युद्ध करने का अवसर पाकर द्वार पर पहले की भाँति खड़े हो गए। उस समय वे लोगों को मारने के लिए उद्यत हुए मृत्यु के समान प्रतीत हो रहे थे॥ 41॥ |
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| Having killed those five brave commanders along with their army and vehicles on the battlefield, the great monkey Hanuman once again got the opportunity to fight and stood at the gate as before. At that time he looked like death itself, ready to kill the people.॥ 41॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥ |
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