|
| |
| |
श्लोक 5.45.17  |
स तान् प्रवृद्धान् विनिहत्य राक्षसान्
महाबलश्चण्डपराक्रम: कपि:।
युयुत्सुरन्यै: पुनरेव राक्षसै-
स्तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणम्॥ १७॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| उन बड़े-बड़े राक्षसों का वध करके अत्यंत पराक्रमी और महाबली वानर योद्धा हनुमान्जी पुनः अन्य राक्षसों से युद्ध करने की इच्छा से उसी द्वार पर पहुँचे॥17॥ |
| |
| After killing those big demons, the extremely valiant and mighty monkey warrior Hanuman again reached the same gate with the desire to fight with other demons.॥ 17॥ |
| |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चचत्वारिंश: सर्ग:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४५॥ |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|