श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 44: हनुमान जी के द्वारा चैत्यप्रासाद का विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  5.44.9 
तत्तस्य रक्तं रक्तेन रञ्जितं शुशुभे मुखम्।
यथाऽऽकाशे महापद्मं सिक्तं काञ्चनबिन्दुभि:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
रक्त से सना हुआ उसका मुख ऐसा सुन्दर लग रहा था मानो आकाश में कोई विशाल लाल कमल सुवर्ण की बूंदों से सींचा गया हो और मानो उस पर स्वर्ण का लेप किया गया हो॥9॥
 
His face, stained with blood, looked as beautiful as if a huge red lotus in the sky had been watered with drops of golden water and as if it had been coated with gold.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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