श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 44: हनुमान जी के द्वारा चैत्यप्रासाद का विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.44.4 
तस्य विस्फारघोषेण धनुषो महता दिश:।
प्रदिशश्च नभश्चैव सहसा समपूर्यत॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उस धनुष की टंकार से सारी दिशाएँ, उपदिशाएँ और आकाश सहसा गूंज उठे ॥4॥
 
All directions, sub-directions and the sky suddenly resounded with the loud sound of that bow. ॥4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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