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श्लोक 5.44.4  |
तस्य विस्फारघोषेण धनुषो महता दिश:।
प्रदिशश्च नभश्चैव सहसा समपूर्यत॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| उस धनुष की टंकार से सारी दिशाएँ, उपदिशाएँ और आकाश सहसा गूंज उठे ॥4॥ |
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| All directions, sub-directions and the sky suddenly resounded with the loud sound of that bow. ॥4॥ |
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