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ramayan 5.43.1: सेवकों को मारने के बाद हनुमान ने सोचा, 'मैंने वन को नष्ट कर दिया है, परंतु मैंने इस चैत्य महल को नष्ट नहीं किया है।' 1.   |   ramayan सर्ग 5.43: हनुमान जी के द्वारा चैत्यप्रासाद का विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 43: हनुमान जी के द्वारा चैत्यप्रासाद का विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.43.1 
तत: स किंकरान् हत्वा हनूमान् ध्यानमास्थित:।
वनं भग्नं मया चैत्यप्रासादो न विनाशित:॥ १॥
 
 
अनुवाद
सेवकों को मारने के बाद हनुमान ने सोचा, 'मैंने वन को नष्ट कर दिया है, परंतु मैंने इस चैत्य महल को नष्ट नहीं किया है।' 1.
 
After killing the servants, Hanuman thought, 'I have destroyed the forest, but I have not destroyed this Chaitya palace.' 1.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)