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श्लोक 5.42.8  |
अथाब्रवीत् तदा साध्वी सीता सर्वाङ्गशोभना।
रक्षसां कामरूपाणां विज्ञाने का गतिर्मम॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| तब सुन्दर एवं गुणवती सीता बोलीं - 'जो राक्षस इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर लेते हैं, उन्हें पहचानने या समझने का मेरे लिए क्या उपाय है?॥8॥ |
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| Then the beautiful and virtuous Sita said, 'What is the means for me to understand or recognise the demons who assume any form at will?॥ 8॥ |
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