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श्लोक 5.42.41  |
विचचाराम्बरे वीर: परिगृह्य च मारुति:।
सूदयामास वज्रेण दैत्यानिव सहस्रदृक्॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| पवनपुत्र वीर उस परिघ को लेकर आकाश में विचरण करने लगे। जैसे सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र अपने वज्र से दैत्यों का संहार करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघ से अपने सामने आने वाले समस्त दैत्यों का संहार किया। 41. |
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| The brave son of Pawan started roaming in the sky with that Parigha. Just as the thousand-eyed Indra kills demons with his thunderbolt, in the same way he killed all the demons who came in front of him with that Parigha. 41. |
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