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श्लोक 5.42.21  |
मन:परिगृहीतां तां तव रक्षोगणेश्वर।
क: सीतामभिभाषेत यो न स्यात् त्यक्तजीवित:॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| हे दैत्यराज! जिन देवी सीता को आपने अपने हृदय में स्थान दिया है, उनसे कौन बात कर सकता है? जिसने अपने प्राणों का मोह नहीं छोड़ा, वह उनसे कैसे बात कर सकता है?॥ 21॥ |
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| ‘King of demons! Who can talk to Goddess Sita, whom you have given a place in your heart? How can someone who has not given up the attachment to his life talk to her?’॥ 21॥ |
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